फाइनली, ट्रेलर खत्म हो गया और फिल्म शुरू हो गयी है। निर्माता, निर्देशक और फाइनेंसर अभी तुरंत रिलीज करना तो नहीं चाहते थे मगर कुछ तो जिस पै तकिया था वही मंदिर दगा देने लगा था और कुछ ग्रह नक्षत्रों की गति और चाल देखकर आज और कल का समय बताने वाली पुराने जमाने की जंत्री ने नयी ताजी ऊर्जा के साथ ऐसा जंतर-मंतर दिखाया कि सरोदा ही नहीं सारा शेड्यूल ही बिगड़ गया। लिहाजा मरता क्या न करता की हड़बड़ी में न मन के सेट्स सजाये जा सके, न ढंग का मेकअप और कॉस्ट्यूम ही जुटाया जा सका। सही-सलामत लाइट्स, कैमरा भी लगाने का समय तक नहीं बचा था। जैसे थे वैसे के वैसे ही भेड़िये स्क्रीन पर लाने पड़े और इस तरह इति श्री संघ पुराणे, भारत खंडे बर्बर अध्याय का प्रीमियर हुआ।
इस चरण की खास विशेषता नेपथ्य में छुपाये गए खलनायकों को सीधे नायकत्व प्रदान करने की है। अब तक जिन्हें एक्स्ट्रा आर्टिस्ट की तरह बीच-बीच में तड़का लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा, सालन में तेजपात के पात की तरह तलने और रांधने में साझे और स्वाद लेने के बाद न्यारे किया जाता रहा था, हाशिये के लोग – फ्रिंज एलिमेंट – बताकर मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं का बैकग्राउंड स्कोर सुनाया जाता रहा था : अब वे पूरे गर्व के साथ एकदम आगे हैं। अपने पैने और बदबूदार दांतों, नुकीले नाखूनों वाले पंजों के साथ लाल आँखों से घूरते, आगे के पंजों से जमीन को कुरेदकर हमला बोलने के लिए तत्पर और आमादा। हाल में प्रसिद्धि पाया नमूना स्वतंत्र भारद्वाज रंगमंच पर एकालाप करने वाला एक पात्र नहीं है, कोरस की शुरुआत के पहले वृंदगान का मुखड़ा शुरू करने वालों में से एक है। इसके पहले आरक्षण हटाओ के नाम पर जिनसे आलाप की शुरुआत करवाई थी वे घटिया विदूषक बनकर रह गए। उनके बोल उम्मीद के हिसाब से न तो गूँज पाए न सुर बाँध पाए। जब स्थायी नाट्य मंडली – रेपर्टरी – के जमूरे नहीं चले तो अब तक जिनका कुल गोत्र कुटुंब से बाहर बताया जाता रहा उन्हें सगा बताकर उतारा जा रहा है। यह माजरा ही काफी है उस बदहवासी को समझने के लिए जिसने ऊपर से नीचे तक सबके होश-हवास उड़ा रखे हैं।
जुलाई में हुए जंतर-मंतर के बाद एक भी दिन, एक भी सप्ताह नहीं गुजरा जब फुस्स हुए गुब्बारे को किसी न किसी गटर की गैस से दोबारा फुलाने की कोशिश न की गयी हो। जब एक भी सुर नहीं सधा तो अब छाप, तिलक सब छोड़-छाड़, सारी लोकलाज और दिखावटी मर्यादा को खूंटी पर टांग कर भेड़िये सीधे झपटने और चीथने पर आ गए हैं। बहुत लम्बे समय से जो मानव बम तैयार किये जा रहे थे अब उन्हें सीधे मैदान में उतार दिया गया है। स्वतंत्र भारद्वाज नाम का हाड़-मांस से मनुष्य दिखने वाला प्राणी इसी प्रजाति का है। किन्तु वह अकेला नहीं है। एक पूरा दड़बा ही खोल दिया गया है और उसे बता भी दिया गया कि कहाँ जाना है, किन्हें निशाना बनाना है। इस दड़बे की कुंडी खुद किसी और ने नहीं स्वयं नरेंद्र मोदी ने खोली है।
इस बार किसी अनुषंगी कहे जाने वाले संघी के जिम्मे यह काम नहीं छोड़ा, प्रधानमंत्री के नाते लालकिले से दिए अपने भाषण में खुद उन्होंने किया। राजनीतिक और वैचारिक असहमति के संवैधानिक अधिकार और सवाल उठाने की इंसानी जिम्मेदारी तथा लोकतांत्रिक कर्तव्य को निभाने वालों को ‘दिमागी नक्सल’ बताकर उनके खिलाफ यलगार बोलने का सीधा आह्वान कर दिया। अब तक ‘अर्बन नक्सल’ के लिए जिस शब्द युग्म को तोहमत की तरह उछालते रहे थे उसे छोड़कर उसकी जगह ‘दिमागी नक्सल’ कहना यूँ ही निकल गया बोल-वचन नहीं है। इसकी व्याप्ति नए हालात में व्यापक हुए प्रतिरोध को लपेटने के साथ-साथ उस असली एजेंडे तक जाती है, जिसके विरोध में हाल का प्रतिरोध फूटा था और जो वर्तमान सत्ताधारी विचार कुटुंब का सर्वप्रमुख एजेंडा है।
सरल भाषा में कहें तो इनका लक्ष्य है देश से शिक्षा और विवेक का पूरी तरह से मिटाया जाना। इसी के साथ इससे भी अधिक बुनियादी उद्देश्य है जैसी भी शिक्षा है उसे कुछ मुट्ठीभर लोगों के लिए ही सीमित कर देना। पढ़े-लिखों और पढ़ने-लिखने वालों के प्रति नफरत और घृणा का भाव जगाना। शुरू में जेएनयू से अलीगढ़ वाया जामिया यूनिवर्सिटीज को निशाने पर लिया गया, विशेषज्ञ, अन्वेषक और आविष्कारक बनाने वाली शिक्षाप्रणाली को ध्वस्त कर दिया गया। नीट के पेपर लीक घोटाले जड़ों में मट्ठा डालने के ऐसे ही कारनामे थे। इसके साथ कोंपलों को खिलने से पहले ही मसल देने की साजिश पर चलते हुए प्राथमिक और स्कूली शिक्षा को भी तबाह करना शुरू कर दिया : भाजपा शासित राज्यों में धड़ाधड़ 94 हजार स्कूल्स बंद कर दिए गए।
जिन्हें बंद करने से फिलहाल बख्श दिया है उनकी हालत कितनी खराब है यह इसी से समझा जा सकता है कि विश्वगुरु होने का दावा करने वाले कुनबे ने बाकायदा कानून बनाकर इन स्कूलों की वीडियोग्राफी करने, तस्वीर खींचने तक को अपराध बना दिया है। इस बीच उच्च शिक्षा के गलगोटियाकरण और नीचे से ऊपर तक पाठ्यक्रमों के अंधविश्वासीकरण की मुहिम भी लगातार चलती रही। समझदारी और खोजीपन, आविष्कारी अनुसंधानशीलता को लज्जित और अपमानित करने तथा अज्ञान और जहालत, पोंगापन और मूर्खता को मान-प्रतिष्ठित करने का काम उच्चतम स्तर से किया जाता रहा।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश के वैज्ञानिकों के बीच गटर से गैस निकालने, ट्यूब में हवा भरके खेत में ट्रैक्टर चलाने, गणेश की प्लास्टिक सर्जरी, हवा से पानी बनाने से लेकर बादलों से रडार को चकमा देने की बुद्धिमत्ता का फूट पड़ना ऐसे ही नहीं था। यह सीखने न देने के साथ-साथ सीखे हुए को भुलाने का, निरशिक्षीकरण की आग में आहुति देने का काम था। यही काम था जिसे लालकिले की प्राचीर जैसी भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की ऐतिहासिक जगह से मोदी ने कहा और उसके बाद दिल्ली के एक कॉलेज – श्रीराम कॉलेज – के अपने भाषण में फिर से दोहराया। यहाँ दिमागी नक्सल के साथ-साथ वे असहमति जताने वालों को फूफा बताने तक आ गए।
बीच-बीच में सामाजिक समरसता के गीत और दिखावटी प्रतिनिधित्व के नर्तन-कीर्तन, मुसलमानों के अलगाव के दांव-पेंचों के बाद अब पटकथा ने मूल कहानी को ठीये पर पहुंचाने पर फोकस किया हुआ है। सहायक निर्देशकों को कोने में बिठाकर निर्देशन का काम अब सीधे मनु ने अपने हाथ में ले लिया है और छाप-तिलक सब पोंछ-पांछ कर लुच्चे और लफंगों को फ्रंटलाइन पर खड़ा कर दिया है। जो अब द्विअर्थी संवादों की आड़ छोड़कर सीधे मनुसम्मत संवाद उगल रहे हैं।
चौदह वर्ष की अवयस्क लड़की निशु आजाद के पिता पर हमले के बारे में खुद को मोदी, कपिल मिश्रा और चिराग पासवान का छोटा भाई बताने वाला, प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण सहित उनके सभी आयोजनों की अतिथि सूची में शामिल लफंगे स्वतंत्र भारद्वाज और उसके शक्ल से ही अपराधी दिखने वाले संगी साथियों ने जिस तरह की हेंकड़ी के साथ टारगेटेड हिंसा का ऐलान किया है वह स्क्रिप्ट का हिस्सा। यह सिर्फ निशु तक सीमित नहीं है, दलितों और आदिवासियों को उनकी “औकात” दिखाने की साफ-साफ शब्दों में बेधड़क होकर दी गयी धमकी है। पिछड़े समुदाय को अभी उस समुदाय के नेताओं के बहाने निशाने पर लिया जा रहा है – मगर मकसद छुपाया भी नहीं जा रहा है। निबटाने के लिए तय किये गए टारगेट्स में ‘दिमागी नक्सल’ को शामिल किया जाना और प्रधानमंत्री द्वारा उस पर अतिरिक्त जोर दिया जाना इसी की कड़ी में है।
संघ की आईटी सेल के नए अवतार के साथ जोड़कर देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि यह समग्र का हिस्सा है। आईटी सेल – जो असल में इंटरनेट और सोशल मीडिया के मोर्चे पर संघ का बजरंग दल है – उसका पहले का अवतार भी शाकाहारी नहीं था। मगर उसका मुख्य जोर झूठ और अर्ध-झूठ गढ़ने, नफरती नैरेटिव तैयार करने और मोदी सरकार की अरक्षणीय असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए ‘पां पां ने वार रुकवा दी’ जैसी नकली उपलब्धियों का प्रचार करने और पाताल में जा पहुंची विदेश नीति को विश्वगुरु का जामा पहनाने की रहती थी। मगर जंतर-मंतर पर जेन जी द्वारा इसे पूरी तरह धूल चटाने के बाद इस कथित आईटी सेल में जिन्हें पधराया गया है उन्होंने तो विरोधियों के विरुद्ध हिंसा के सीधे आह्वानों की झड़ी ही लगा दी है। इसमें भी नयी बात यह है कि अब यह काम वेश बदलकर या नकली आईडी से नहीं सीधे भारतीय जनता पार्टी के नाम से किया जा रहा है। ऑल्ट न्यूज़ द्वारा संकलित इनके हाल के कुछ कारनामों पर निगाह डालने से पाशविक इरादे समझ आ जाते हैं।
भाजपा की कर्नाटक यूनिट ने फ़िल्म केजीएफ का एक क्लिप वाला मीम शेयर किया, जिसमें मुख्य किरदार अपने विरोधियों पर गोलियों की बौछार करता है। इस मीम में, गोली चलाने वालों को भाजपा की राज्य इकाई के रूप में दिखाया है, जबकि विरोधियों को ‘दिमागी नक्सल’ कहा गया है। इसके साथ लिखे कैप्शन में कहा गया, “हम रुकेंगे नहीं, हम पूरी ताक़त से ‘अर्बन नक्सल’ का सामना कर रहे हैं।” छत्तीसगढ़ भाजपा ने वेब सीरीज़ ‘मिर्ज़ापुर’ का एक क्लिप पोस्ट किया जिसमें ‘मुन्ना भैया’ नाम का किरदार एक छात्र को बार-बार थप्पड़ मारता है। क्लिप में छात्र को ‘दिमागी नक्सल’ के तौर पर दिखाया गया है। पोस्ट के कैप्शन में कहा गया है कि ‘दिमागी नक्सल’ बनने के बजाय, कोई ऐसा व्यक्ति बन सकता है जो देश की तरक्की में योगदान दे। ध्यान देने वाली बात यह है कि थप्पड़ मारने वाला व्यक्ति एक गुंडा है, जबकि थप्पड़ खाने वाला छात्र है जिसे ‘दिमागी नक्सल’ कहा है।
हिमाचल प्रदेश बीजेपी ने वेब सीरीज़ ‘मिर्ज़ापुर’ का एक और सीन पोस्ट किया, जिसमें एक किरदार चाकू लहराता है, जबकि दूसरा टेबल पर रिवॉल्वर रखता है और पहले किरदार को ज़ोरदार थप्पड़ मारता है। इस सीन में, चाकू वाले किरदार को ‘दिमागी नक्सल’ के तौर पर दिखाया गया है, जबकि दूसरा किरदार हिमाचल प्रदेश बीजेपी को दिखाता है। पोस्ट के साथ लिखे कैप्शन में कहा गया है कि यह ‘दिमागी नक्सल’ की हालत को दिखाता है। इसी तरह, बंगाल बीजेपी ने भी मारपीट वाला एक सीन पोस्ट किया, जिसके साथ कैप्शन था: “बेफिक्र, मॉइस्चराइज़्ड, अपनी धुन में मस्त, बस दिमागी नक्सलियों की धुलाई कर रहे हैं।” तेलंगाना बीजेपी यूनिट ने भी जेन जी के साथ मिलकर ‘दिमागी नक्सलियों’ की धुलाई करने के बारे में एक मीम पोस्ट किया।
पंजाब बीजेपी ने एक वीडियो में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को थप्पड़ मारते हुए दिखाया गया है। इसमें काल्पनिक किरदारों का इस्तेमाल नहीं किया गया था। बल्कि एआई का इस्तेमाल करके राज्य के चुने हुए मुख्यमंत्री पर शारीरिक हमले का सीन बनाया गया, जिससे एक असली और पहचाने जा सकने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ हिंसा की झूठी तस्वीर पेश कर एक तरह से ऐसा करने का आह्वान किया गया है।
सनद रहे कि ये सभी वीडियो बीजेपी के आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल पर भी पोस्ट किए गए हैं। इस तरह अब यह केंद्र और अनेक राज्यों की सरकारों में बैठी पार्टी की आधिकारिक स्थिति है – जिसमें सीधी हिंसा और हमलों का आह्वान आतंकियों के विरुद्ध नहीं, उन नागरिकों के खिलाफ है जो असहमत हैं, जो सरकार की नीतियों को लेकर सवाल उठाते हैं। इनमें उन युवाओं को निशाने पर लेने का आह्वान है जो शिक्षा की बेहतरी और रोजगार को लेकर सवाल उठाते हैं। यह सिर्फ डराने-धमकाने भर की गुर्राहट नहीं है, यह राजनीतिक फैसले के तहत, प्रशासनिक संरक्षण में किया जाने वाला संगठित, सुविचारित और योजनाबद्ध अपराध है। यह लोकतंत्र को चींथने के लिए भेड़ियों को छोड़ दिया जाना है।
यूनानी और पश्चिम की लोककथाओं, पौराणिक कथाओं में भेड़िये के अवतार का संबंध आमतौर पर पूर्णिमा से माना जाता है। पूरब की कुछ खास पौराणिक मान्यताओं और तांत्रिक कहानियों में अमावस्या का भी अपना एक विशेष महत्व है। यहाँ ‘अमावस्या के भेड़िये’ को अधिक खतरनाक माना जाता है क्योंकि वे अंधेरे का फायदा उठाते हैं। ये उस अमावस के भेड़िये हैं जिस अमावस को पिछले 12 वर्ष के मोदी राज ने गहरा और दीर्घायु बना दिया है। शिकारी कॉरपोरेट मित्रों के खजाने भरने के चक्कर में अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ चुका है। एक भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसमें बताने के लिए कोई बढ़त या उपलब्धि हो।
जीडीपी के झूठ को दुनिया की आर्थिक संस्थाएं पहले से जानती बताती रही थीं, अब घर में भी कोई यकीन करने को तैयार नहीं है। रही-सही कसर राममंदिर की चढ़ावा चोरी ने पूरी कर दी है। कुल जमा यह कि अलगाव बढ़ रहा है, पांवों तले से जमीन तेजी से खिसकने लगी है। इस-उस बहाने जनता की एकता बिखेरने की चालें बहुमत हिंदुस्तानी समझने लगे हैं। भारी निवेश के साथ फैलाया गया कुहासा छंट रहा है और सत्ता से धकेल बाहर किये जाने का डर मन में बैठ रहा है। अमावस्या के भेड़ियों ने खुद अपनी अमावस के आने की आहट सुन ली है। रग-रग में तानाशाही और परवरिश में फासीवाद के चलते कोई ग्लानि, पश्चाताप या सुधार प्रवृत्ति में ही नहीं है – इसलिए ज्यादा बड़े और नृशंस हमले की फिजा बनाई जा रही है।
इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। इतिहास सिर्फ याद नहीं दिलाता, वह सबक भी देता है और वह सबक यह है कि अगर हुक्मरान संविधान, लोकतंत्र, जनता के जीवन और युवाओं के भविष्य पर हमलावर होने के लिए उद्यत हो रहे हैं तो उसके होने का इंतजार करने की बजाय उससे पहले ही जागर की मुहिम तेज करनी होगी। हम भारत के लोगों को संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, समाजवादी गणराज्य की हिफाजत के लिए एकजुट करना होगा। और यह काम हम भारत के लोग ही कर सकते हैं, कर भी रहे हैं।
(बादल सरोज अखिल भारतीय किसान सभा संयुक्त सचिव और लोकजतन के संपादक हैं।)